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समीक्षा ****** काव्य संग्रह : ख़ामोशी की चीखें

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काव्य संग्रह : सूरज में तारों की तलाश समीक्षक : रजनी छाबड़ा

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काव्य संग्रह : सूरज में तारों की तलाश  कवि : राजेन्द्र जोशी  पेपर बैक : मूल्य रु 200 /- मात्र  हार्ड बाउंड : मूल्य रु. 350 /- मात्र  प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स  समीक्षक : रजनी छाबड़ा  स्पष्टवादी, संवेदनशील व् यथार्थ के धरातल पर साहित्य सृजनकर्ता  राजेन्द्र जोशी  का यह चतुर्थ काव्य संग्रह है , जो ' उजाले की साखी ', 'रात के पिछले पहर ' और 'वक़्त अभी शेष है ' नामक तीन खण्डों में विभाजित है/ सामाजिक परिवेश, प्राकृतिक सौंदर्य, आस्था , पर्यावरण चेतना, राजनैतिक पतन पर कटाक्ष ,  प्रेम की कोमल भावनाओं और आस विश्वास के रंगो से उकेरा गया यह काव्य संग्रह  पाठकों के मन के दरवाज़े पर आहट देता प्रतीत होता है/ मानव  मन की कोमल भावनाओं का चित्रण और जीवन की विभिन्न स्थितियों में सामंजस्य का आह्वान सीधे, सरल शब्दों में किया गया हैं /  निष्ठुरता से दमन की जा रही मानवीय संवेदनाओं से कवि मन आहत है/  'अब मेरे रोम रोम में बसी है तुम्हारी पीड़ा'  और 'पी लूँगा तुम्हारी हर वेदना', आश्वस्त करती प्रतीत होती है/ कवि  मानवी...

डॉ. संजीव कुमार : पारदर्शी व्यक्तित्व एवं बेजोड़ साहित्यकर्म : आलेख : रजनी छाबड़ा

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  डॉ. संजीव कुमार : पारदर्शी व्यक्तित्व एवं बेजोड़ साहित्यकर्म/  आलेख : रजनी छाबड़ा  व्यक्तित्व :मनस्वी , तेजस्वी , लोकप्रिय कवि , साहित्यकर्मी ,समीक्षक, प्रकाशक ,  समाजसेवक, बी पी एल एडवायज़री बोर्ड केअध्यक्ष व् उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता , बजाज ग्रुप से कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत /  मैं अलग अलग व्यक्तियों का ज़िक्र नहीं कर रही हूँ/  विस्मित हूँ कि इतनी खूबियां एक ही व्यक्ति में कैसे समाहित हैं/ यह बहुआयामी शख्सियत है ----डॉ. संजीव कुमार  डॉ. संजीव से प्रथम परिचय फेसबुक पर हुआ/ मैं उन दिनों बीकानेर से सेवानिवृत होकर बैंगलोर में मेरा बसेरा था  और डॉ. साहिब उस समय, अमेरिका से भारत आकर स्थाई रूप से बसने के साथ ही साथ , एक पब्लिशिंग हाउस की स्थापना की योजना बनाये हुए नॉएडा आये थे/ यह मेरा सौभाग्य है कि मेरी नुमेरोलॉजी करियर गाइड के साथ आपके प्रकाशन कार्य की शुरुआत हुई और आपके साथ यह जुड़ाव लगातार बना हुआ है / मेरी अब तक विभिन्न आयामों पर लिखी १३ पुस्तकें आप द्वारा प्रकाशित हो चुकी हैं/ एक प्रकाशक के रूप में उनकी प्रशंसनीय बात यह है कि जब जब ...
 गत कुछ वर्षों में मेरे काव्य संसार पर जो समीक्षाएं सुधि आलोचकों एवं समीक्षकों ने लिखी और मैंने जो समीक्षाएं लिखी, समय के अभाव के कारण, मैं उन्हें संकलित नहीं कर पायी/ आज अपने इस नवीन ब्लॉग 'तीसरी आँख ' में इनका संचयन किया है और भविष्य में इस ब्लॉग के माध्यम से आप तक समीक्षा पहुँचाने का सिलसिला बना रहा, इसके लिए प्रयासरत रहूंगी/  आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा/ रजनी छाबड़ा 

समीक्षा काव्य संग्रह : सांवर दइया की चयनित राजस्थानी कवितायेँ

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   समीक्षा  काव्य संग्रह : सांवर दइया की चयनित राजस्थानी कवितायेँ  चयन-अनुवाद : नीरज दइया  पेपरबैक: मूल्य रु. 200 /- मात्र  प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स , नोएडा  सांवर दइया आधनिक राजस्थानी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर / सशक्त कथाकार, कवि  व् व्यंग लेखक के रूप में हिंदी व् राजस्थानी साहित्य जगत में उनकी विशिष्ट पहचान है/ राजस्थानी के साथ साथ हिंदी, अंग्रेज़ी और गुजराती भाषाओँ पर उनका अधिकार था/ उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों में साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत गुजराती निबन्ध संग्रह ' स्टेच्यू '{ अनिल जोशी ) का राजस्थानी अनुवाद भी किया जो साहित्य अकादेमी से वर्ष 2000 में प्रकाशित हुआ/ 1985  में उन्हें कहानी संग्रह पर साहित्य अकादमिक का मुख्य पुरस्कार मिला/ आधुनिक राजस्थानी कविता के इतिहास में सांवर दइया को प्रयोगशील कवि  के रूप में विशेष रूप से पहचाना गया है/ मात्र 44  वर्ष की आयु में असमायिक निधन/ नश्वर शरीर दुनिया में न रहने के बाद भी, उनका साम्रज्य कायम है साहित्य प्रेमियों के दिलों पर/  उनकी कई रचनाएँ , उनके जीवनकाल...

समीक्षा ****** काव्य संग्रह : ख़ामोशी की चीखें

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    समीक्षा ******   काव्य संग्रह : ख़ामोशी की चीखें  कवि : डॉ संजीव कुमार  प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स ,नोएडा  पेपरबैक; मूल्य रु. 225 मात्र  यह वादी धुंआ धुंआ क्यों हैं?  लहू ज़र्द हुआ क्यों है ? जी हाँ, मैं  ज़िक्र कर रही हूँ कश्मीर की हसीन वादियों का/ उन शांत, सुरमई वादियों का जहाँ कभी सुकून का बोलबाला था/ सभी धर्म अनुयायिओं का सौहार्द पूर्ण सह-अस्तित्व था / जाने किस की नज़र लग गयी और देखते ही देखते ज़न्नत ज़ह्नुम में तब्दील होने लगी/ सियासतों के इस दौर में , अब तो खुल कर सांस लेना भी दुश्वार हो गया है/ कभी हंसती गुनगुनाती वादियों में अब तो सुनायी देती हैं बस खामोशी की चीखें / अत्यंत भावुक, संवेदनशील , निर्भीक , मनचक्षु से दुनिया देखने वाले प्रतिष्ठित कवि डॉ. संजीव कुमार के सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह 'ख़ामोशी की चीखें' पढ़ते हुए, अपने अतीत के  उन सुनहरे दिनों की याद मन में कौंध रही है जो मैने अपनी सनातक शिक्षा प्राप्ति के दौरान कश्मीर में बिताए / संन 1970  से 1973 का स्वर्णिम समय जो मैंने धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर की हस...

होने से न होने तक की समीक्षा: सूरज सिंह सार्की

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  सूरज सिंह सार्की जी ने मेरे प्रथम हिंदी काव्य संग्रह होने से न होने तक की समीक्षा से अपनी समीक्षा विधा की शुरुआत की है/ उनके प्रयास के लिए आभार/ नमस्कार मित्रों.... किसी किताब पर कभी कुछ लिखा नहीं..... हाल- फिलहाल रजनी छाबड़ा जी का काव्य संग्रह "होने से न होने तक" पढ़ा....न आलोचना, न समीक्षा है। बस काव्य संग्रह में क्या समाहित है उसी को बताने का प्रयास किया है........मेरा पहला प्रयास आपके सम्मुख... होने से न होने तक कवियत्री रजनी छाबड़ा जी का पहला काव्य संग्रह " होने से न होने तक" अयन प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है । इस काव्य संग्रह में छोटी - बड़ी कुल 62 कविताएं है । संग्रह की पहली कविता 'हम जिंदगी से क्या चाहते है' में वर्तमान समय के युवाओं का भटकाव दिखाया गया है फिर भी इन भटकते युवाओं में ज़ज़्बा तो है जो इन्हें जिलाये रखता है ' हम खुद नहीं जानते हम जिंदगी से क्या चाहते है कुछ कर गुजरने की चाहत मन में लिए अधूरी चाहत में जिए जाते है' यहाँ युवा कुछ नया करना चाहता है मगर घर के लोगों ने ही संस्कारों की दुहाई देकर उसके नए सोच को, नयी रीती- नीति को हम...

पिघलते हिमखंड: समीक्षक केदार नाथ शब्द मसीहा

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  केदार नाथ शब्द मसीहा O t c t i t o S b e 3 r m 2   t 6 6 ,   o 4 o f 2 0 c 1 7    ·  केदार नाथ शब्द मसीहा O t c t i t o S b e 3 r m 2   t 6 6 ,   o 4 o f 2 0 c 1 7    ·  पिघलते हिमखंड ------------------- रजनी छाबड़ा जी का काव्य संग्रह 'पिघलते हिमखंड' मुझे उपहार स्वरूप मिला था .निजी व्यस्तताओं के चलते मैं उसे पढ़ नहीं पाया था . आज उसे पढने का मौका मिला तो सोचा कि एक पाठकीय प्रतिक्रिया आप तक पहुंचाने का प्रयास करूँ . अयन प्रकाशन , दिल्ली से यह संग्रह २०१६ में प्रकाशित हुआ . इसका मूल्य दो सौ रुपये हैं और तिरेसठ कविताओं का यह गुलदस्ता कुल ९६ पेज में सहेजा गया है . रजनी छाबड़ा जी दिल्ली में जन्मी और ३५ वर्ष तक बीकानेर में राजकीय सेवा में रही . स्वैछिक सेवानिवृति के उपरान्त सपरिवार बेंगलुरु में निवास करती हैं. अंग्रेजी की लेक्चरार रहीं हैं और अंकशास्त्र में अपना दखल रखती हैं .अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ और लेख प्रकाशित हुए हैं . ब्लॉग लिखती हैं अपना यू ट्यूब चैनल भी है उनका जहाँ वे अपने विचार लोगों तक पहुंचाती हैं . 'मधुवन' कवि...