काव्य संग्रह : सूरज में तारों की तलाश समीक्षक : रजनी छाबड़ा




काव्य संग्रह : सूरज में तारों की तलाश 

कवि : राजेन्द्र जोशी 

पेपर बैक : मूल्य रु 200 /- मात्र 

हार्ड बाउंड : मूल्य रु. 350 /- मात्र 

प्रकाशक : इंडिया नेटबुक्स 

समीक्षक : रजनी छाबड़ा 

स्पष्टवादी, संवेदनशील व् यथार्थ के धरातल पर साहित्य सृजनकर्ता  राजेन्द्र जोशी  का यह चतुर्थ काव्य संग्रह है , जो ' उजाले की साखी ', 'रात के पिछले पहर ' और 'वक़्त अभी शेष है ' नामक तीन खण्डों में विभाजित है/ सामाजिक परिवेश, प्राकृतिक सौंदर्य, आस्था , पर्यावरण चेतना, राजनैतिक पतन पर कटाक्ष ,  प्रेम की कोमल भावनाओं और आस विश्वास के रंगो से उकेरा गया यह काव्य संग्रह  पाठकों के मन के दरवाज़े पर आहट देता प्रतीत होता है/ मानव  मन की कोमल भावनाओं का चित्रण और जीवन की विभिन्न स्थितियों में सामंजस्य का आह्वान सीधे, सरल शब्दों में किया गया हैं /  निष्ठुरता से दमन की जा रही मानवीय संवेदनाओं से कवि मन आहत है/ 

'अब मेरे रोम रोम में बसी है तुम्हारी पीड़ा'  और 'पी लूँगा तुम्हारी हर वेदना', आश्वस्त करती प्रतीत होती है/

कवि  मानवीय संवेदनाओं के क्षरण से व्यथित है और यह चिंता इस संग्रह में बार बार झलकती है/ प्रशासन की असंवेदनशीलता पर भी कवि ने अपनी सशक्त लेखनी से प्रहार किया है/

आदमी को 

अस्पताल पहुँचाया जाएगा 

खाली नहीं होगा पलंग 

जमीन पर लेटे लेटे ही 

शरीर बदरंगी  रंगों में रम जायेगा 

फ़िल्टर फिर भी 

दुरुस्त नहीं हो पायेगा/ 


'बारह किलोमीटर ' कविता में मानवीय मूल्यों के पतन की पराकाष्ठा झलकती है /

लोग देख रहे थे 

माँ की देह 

जिसे चार कंधे नहीं

एक ही कंधे से संतोष करना पड़ा 


नहीं मिला कोई और कंधा 

न ही कोई गाड़ी  मिली 

बारह किलोमीटर के रास्ते 

हाँ ! दुनिया को दिखाने के 

लिए 

टी. वी. चैनल  की गाड़ी मिली 

जो चली गयी न्यूज़ बनाकर!


रिश्वतखोरी  पर कटाक्ष करते हुए कवि लिखता है 

बेखबर नहीं है गाँधी 

खुद की उपस्थिति से 

खामोश ताकता तस्वीर में बैठा 


एक कागज़ की 

अर्ज़ी के नीचे छिपा 

अपनी औकात पहचानता है 

जब खुद को

 अफसर की टेबल पर पाता  है 

सरकार की उदासीनता कवि मन को आहत करती है/ तालाबों  की  हालत शोचनीय  है / निरीह पंछी भी अपनी व्यथा कहें भी तो किस से /

पुराने हो गए तालाब 

नहीं टिकता इनमें अब पानी 

तालाब के बीचों बीच 

एक गहरे खड्डे में बचा है जो 

वो मटमैला और बदबूदार होते हुए भी 

पानी है 


'सोन चिड़ी बीमार है 

क्योंकि ! चोंच जाम है 

पाळसिया भरा है 

आधा पानी जाम है 


कई रचनाएँ सांकेतिक  है/ गमले में क़ैद पौधों को पीड़ा के माध्यम से  प्राणी मात्र की परतंत्रता की पीड़ा  की ओर इंगित करते है/

कवि  के लिए मनुष्य का अस्तित्व और भूख का प्रश्न ईश्वर से  भी बड़ा है/ मानवता और विशाल हृदय प्रेम से कवि इतना ओत -प्रोत है कि कोई भी उसको उस से चुरा नहीं सकता/ 

अपने दिवंगत पिता को सम्बोधित करते हुए कवि उन्हें आश्वस्त करता है 

अभी भी प्रयासरत हूँ 

तुम्हारी विरासत सँभालने के लिए 


तुम्हारी विरासत में अँधेरा नहीं 

विरासत में माँ हे मिली 

रोशन है सब आज भी 

क्योंकि माँ हैं इस घर में 

प्रेम की परिभाषा , दादी माँ के आदेश को सर आँखों पर लेते हुए, उनकी पसंद से घर में कवि की जीवन संगिनी का आगमन सरसता से रंगी कविता है/ 

बादल, हवा, सूरज, तारे, पेड़, पत्ते , फूल, कोहरा, बारिश, रेत , समुद्र सभी कवि के मन को लुभाते है और वह इस सृष्टि के सृजनहार से भी संवाद करता है/ 

लॉक है मंदिर 

एकांत में देवता 

पर अँधेरे में नहीं 


लोक में है भक्त 

प्रार्थना  में लीन 

भय मुक्त 

मिल न सकूं तौ क्या 

ध्यान में तो हूँ 

सुनाई देता होगा उसको 

मेरा स्वर /


कवि की कविताओं में आशावादिता के स्वर गूंजते हैं /

 सोया दिखता है शहर 

तीसरी आँख खोल रहा है 

मूल्यांकन अभी होना है 

वक़्त हो रहा है 

  कुल मिलाकर ,काव्य संग्रह की विभिन्न आयामों पर रचित कवितायेँ  पाठक मन को कवि मन से एककार करने की सामर्थ्य रखती है/ जीवन की विभिन्न परिस्थितियों  में सामंजस्य बनाये रखने की प्रेरणा देती है/

प्रभु से कामना करती हूँ कि कवि  राजेन्द्र जोशी  सदैव शोहरत की बुलंदियां छूते रहें /

रजनी छाबड़ा 

बहु भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका 

rajni .numerologist @gmail .com 




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