पिघलते हिमखंड: समीक्षक केदार नाथ शब्द मसीहा

 

पिघलते हिमखंड
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रजनी छाबड़ा जी का काव्य संग्रह 'पिघलते हिमखंड' मुझे उपहार स्वरूप मिला था .निजी व्यस्तताओं के चलते मैं उसे पढ़ नहीं पाया था . आज उसे पढने का मौका मिला तो सोचा कि एक पाठकीय प्रतिक्रिया आप तक पहुंचाने का प्रयास करूँ .
अयन प्रकाशन , दिल्ली से यह संग्रह २०१६ में प्रकाशित हुआ . इसका मूल्य दो सौ रुपये हैं और तिरेसठ कविताओं का यह गुलदस्ता कुल ९६ पेज में सहेजा गया है .
रजनी छाबड़ा जी दिल्ली में जन्मी और ३५ वर्ष तक बीकानेर में राजकीय सेवा में रही . स्वैछिक सेवानिवृति के उपरान्त सपरिवार बेंगलुरु में निवास करती हैं. अंग्रेजी की लेक्चरार रहीं हैं और अंकशास्त्र में अपना दखल रखती हैं .अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ और लेख प्रकाशित हुए हैं . ब्लॉग लिखती हैं अपना यू ट्यूब चैनल भी है उनका जहाँ वे अपने विचार लोगों तक पहुंचाती हैं .
'मधुवन' कविता में जीवन का एक मंत्र वे देते हुए लिखती हैं कि :-
यादों की
बयार से
नेह की
फुहार से
बनता जीवन
मधुबन .....
वाकई जीवन इन्हीं सब का सम्मिश्रण ही तो है . अगर ये भावनाएं जीवन में न हों तो फिर ख़ुशी और अपनेपन के अभाव में क्या जीवन को हम मधुबन कह सकते हैं ! बिलकुल नहीं कहा जा सकता . यही बात हमें अन्य जीवों से अलग कर मानव बनाती है .
आगे भी वह अपने इस विचार को पुनः पोषित करते हुए लिखती हैं कि :-
वक्त के आँचल में सहेजे
लम्हा-लम्हा अहसास
ख़ुदा की बंदगी हैं
सही कहा है उन्होंने . आदमी में ख़ुद ख़ुदा का वास है और अगर आदमी का आदमी से प्रेम हो तो यह जीवन बंदगी और दुनिया जन्नत बन सकती है .
जीवन की एक और सच्चाई को कुछ इस तरह ब्यान किया है उन्होंने ...
खुशियों पर अमूमन
जमाने का पहरा होता है
गम सिर्फ़ अपना होता है
जब बहुत गहरा होता है
इस परिस्थिति से कभी न कभी हम सभी दो चार होते हैं . बहुत कम लोग होते हैं जिनपर अपना दुःख और गम जाहिर किया जा सकता है . अक्सर गम का सरमाया अपने ही मन की कोठरी में सहेजे रखना होता है .
कलाकार की वेदना को भी बा-ख़ूबी उन्होंने शब्द देते हुए कविता में लिखा है :-
परकटे पाखी सा
घायल एहसास लिए
वह कलाकार
रहन रख चुका था
अपनी अनुभूतियाँ
कल्पनाएँ
संवेदनाएं
अपनी कला के
संरक्षक को .......
आजकल इस वेदना को बहुत से लोग झेलते हैं अपने जीवन में . कई लोग सम्मान को अपना हक़ मानकर दूसरे की भावनाओं का प्रतिकार करते हैं . यह कविता उन भावों को बहुत खूबसूरती से व्यक्त करती है.
जीवन जीने की कला का वह रहस्योद्घाटन कुछ इस तरह से करती हैं :-
यूँ ही तुम
अश्क समेटे रहो
ख़ुद में
दुनिया को दो
सिर्फ़ मुस्कान
अपनी अनाम ज़िन्दगी को
यूँ दो एक नयी पहचान !!
जीवन ऐसा ही है और जीवन में किस तरह अनुसरण और व्यवहार करना चाहिए इन पंक्तियों से स्पष्ट संकेत मिलता है . कोई भी आपके रुदन का साथी नहीं है. वह आपका नितांत अपना है. अतः जीवन की पहचान मुस्कान बांटने वाली ही बनायी जाय , यही बेहतर विकल्प है .
जीवन जीने के लिए आदमी को क्या चाहिए ? बहुत कुछ जरुरी तो नहीं. रजनी छाबड़ा जी कहती हैं :-
एक ख्व़ाब
बेनूर आँखों के लिए
एक आह
खामोश लब के लिए
एक पैबंद
चाक जिगर
सीने के लिए
काफ़ी हैं
इतने सामान
मेरे जीने के लिए ....
वाकई अधिक की चाह जीवन को जलता नरक बना देती है . क्या इतना भर काफ़ी नहीं इस ज़िन्दगी को गुजारने के लिए . सुकून ही जीवन की मंज़िल है और उसका रास्ता है बेताबी .
एक खोई हुई नारी का वर्णन करते हुए वह कहती हैं :-
क्या शिकवा करूं गैरों से
अपनों ने ही छीन ली
मुझ से मेरी पहचान .....
स्त्री के विषय में शायद एक स्त्री ही इस दर्द को समझ सकती है . वह बेटी , बहन, पत्नी माँ , दादी, नानी सब रूप जीती है मगर फिर भी उसकी अपनी क्या पहचान रह जाती है ? ये कविता नारी के जीवन के उस रूप को बहुत सहजता से सरल शब्दों में पाठक के सामने रखती है .
इस काव्य संग्रह का नाम जिस कविता से प्रेरित है उसके जिक्र के बिना पाठकीय प्रतिक्रया अधूरी लगती है .
पिघलते हैं हिमखंड
सर्द रिश्तों के
विश्वास की
उष्णता
देकर देखो
वाकई जीवन को जीना है तो बादल के समान जीवन यात्रा को जीना बहुत जरुरी है. यही जीवन का दर्शन भी है . जिस तरह आत्मा को परमात्मा नाम के समुद्र से दूर होकर फिर उसी में समां जाना है उसी तरह पानी का सफ़र भी है और जीवन की बहती भावनाओं का भी .
रजनी छाबड़ा जी की इन कविताओं में सरल भाषा और सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया गया है . कुछ कठिन कहने या फिर विद्वता झाड़ने की कोशिश नहीं की गयी है किन्तु फिर भी भोगे जीवन का यथार्थ साफ़ दृष्टिगोचर होता है . यह सरलता से देखा जा सकता है की कविताओं में उन्होंने जीवन, समाज, प्रकृति, संस्कार इत्यादि के प्रति अपनी सोच को ही ढाला है कविताओं में .
एक सरल सुन्दर और सुग्राह्य काव्य संकलन इसे कहा जा सकता है . भाषाई कमियों पर थोड़ा-सा सम्पादकीय निरिक्षण और होता तो शब्दों के जानकार भी और ख़ुश होते किन्तु मेरे जैसे सामान्य पाठक ने इसका भरपूर आनंद लिया , क्योंकि कविता में शब्दों की त्रुटियों को भावों के रंग और खुशबू छिपा लेते हैं . रजनी छाबड़ा जी को इस काव्य संग्रह के लिए मेरी असीम शुभकामनायें और साथ ही कृतज्ञता भी व्यक्त करना चाहता हूँ उनकी सहृदयता के लिए , जो उन्होंने मुझे इस किताब को भेजकर दिखाई है .
शुभ हो ...जय हो !
शब्द मसीहा
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रजनी छाबड़ा जी का काव्य संग्रह 'पिघलते हिमखंड' मुझे उपहार स्वरूप मिला था .निजी व्यस्तताओं के चलते मैं उसे पढ़ नहीं पाया था . आज उसे पढने का मौका मिला तो सोचा कि एक पाठकीय प्रतिक्रिया आप तक पहुंचाने का प्रयास करूँ .
अयन प्रकाशन , दिल्ली से यह संग्रह २०१६ में प्रकाशित हुआ . इसका मूल्य दो सौ रुपये हैं और तिरेसठ कविताओं का यह गुलदस्ता कुल ९६ पेज में सहेजा गया है .
रजनी छाबड़ा जी दिल्ली में जन्मी और ३५ वर्ष तक बीकानेर में राजकीय सेवा में रही . स्वैछिक सेवानिवृति के उपरान्त सपरिवार बेंगलुरु में निवास करती हैं. अंग्रेजी की लेक्चरार रहीं हैं और अंकशास्त्र में अपना दखल रखती हैं .अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ और लेख प्रकाशित हुए हैं . ब्लॉग लिखती हैं अपना यू ट्यूब चैनल भी है उनका जहाँ वे अपने विचार लोगों तक पहुंचाती हैं .
'मधुवन' कविता में जीवन का एक मंत्र वे देते हुए लिखती हैं कि :-
यादों की
बयार से
नेह की
फुहार से
बनता जीवन
मधुबन .....
वाकई जीवन इन्हीं सब का सम्मिश्रण ही तो है . अगर ये भावनाएं जीवन में न हों तो फिर ख़ुशी और अपनेपन के अभाव में क्या जीवन को हम मधुबन कह सकते हैं ! बिलकुल नहीं कहा जा सकता . यही बात हमें अन्य जीवों से अलग कर मानव बनाती है .
आगे भी वह अपने इस विचार को पुनः पोषित करते हुए लिखती हैं कि :-
वक्त के आँचल में सहेजे
लम्हा-लम्हा अहसास
ख़ुदा की बंदगी हैं
सही कहा है उन्होंने . आदमी में ख़ुद ख़ुदा का वास है और अगर आदमी का आदमी से प्रेम हो तो यह जीवन बंदगी और दुनिया जन्नत बन सकती है .
जीवन की एक और सच्चाई को कुछ इस तरह ब्यान किया है उन्होंने ...
खुशियों पर अमूमन
जमाने का पहरा होता है
गम सिर्फ़ अपना होता है
जब बहुत गहरा होता है
इस परिस्थिति से कभी न कभी हम सभी दो चार होते हैं . बहुत कम लोग होते हैं जिनपर अपना दुःख और गम जाहिर किया जा सकता है . अक्सर गम का सरमाया अपने ही मन की कोठरी में सहेजे रखना होता है .
कलाकार की वेदना को भी बा-ख़ूबी उन्होंने शब्द देते हुए कविता में लिखा है :-
परकटे पाखी सा
घायल एहसास लिए
वह कलाकार
रहन रख चुका था
अपनी अनुभूतियाँ
कल्पनाएँ
संवेदनाएं
अपनी कला के
संरक्षक को .......
आजकल इस वेदना को बहुत से लोग झेलते हैं अपने जीवन में . कई लोग सम्मान को अपना हक़ मानकर दूसरे की भावनाओं का प्रतिकार करते हैं . यह कविता उन भावों को बहुत खूबसूरती से व्यक्त करती है.
जीवन जीने की कला का वह रहस्योद्घाटन कुछ इस तरह से करती हैं :-
यूँ ही तुम
अश्क समेटे रहो
ख़ुद में
दुनिया को दो
सिर्फ़ मुस्कान
अपनी अनाम ज़िन्दगी को
यूँ दो एक नयी पहचान !!
जीवन ऐसा ही है और जीवन में किस तरह अनुसरण और व्यवहार करना चाहिए इन पंक्तियों से स्पष्ट संकेत मिलता है . कोई भी आपके रुदन का साथी नहीं है. वह आपका नितांत अपना है. अतः जीवन की पहचान मुस्कान बांटने वाली ही बनायी जाय , यही बेहतर विकल्प है .
जीवन जीने के लिए आदमी को क्या चाहिए ? बहुत कुछ जरुरी तो नहीं. रजनी छाबड़ा जी कहती हैं :-
एक ख्व़ाब
बेनूर आँखों के लिए
एक आह
खामोश लब के लिए
एक पैबंद
चाक जिगर
सीने के लिए
काफ़ी हैं
इतने सामान
मेरे जीने के लिए ....
वाकई अधिक की चाह जीवन को जलता नरक बना देती है . क्या इतना भर काफ़ी नहीं इस ज़िन्दगी को गुजारने के लिए . सुकून ही जीवन की मंज़िल है और उसका रास्ता है बेताबी .
एक खोई हुई नारी का वर्णन करते हुए वह कहती हैं :-
क्या शिकवा करूं गैरों से
अपनों ने ही छीन ली
मुझ से मेरी पहचान .....
स्त्री के विषय में शायद एक स्त्री ही इस दर्द को समझ सकती है . वह बेटी , बहन, पत्नी माँ , दादी, नानी सब रूप जीती है मगर फिर भी उसकी अपनी क्या पहचान रह जाती है ? ये कविता नारी के जीवन के उस रूप को बहुत सहजता से सरल शब्दों में पाठक के सामने रखती है .
इस काव्य संग्रह का नाम जिस कविता से प्रेरित है उसके जिक्र के बिना पाठकीय प्रतिक्रया अधूरी लगती है .
पिघलते हैं हिमखंड
सर्द रिश्तों के
विश्वास की
उष्णता
देकर देखो
वाकई जीवन को जीना है तो बादल के समान जीवन यात्रा को जीना बहुत जरुरी है. यही जीवन का दर्शन भी है . जिस तरह आत्मा को परमात्मा नाम के समुद्र से दूर होकर फिर उसी में समां जाना है उसी तरह पानी का सफ़र भी है और जीवन की बहती भावनाओं का भी .
रजनी छाबड़ा जी की इन कविताओं में सरल भाषा और सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया गया है . कुछ कठिन कहने या फिर विद्वता झाड़ने की कोशिश नहीं की गयी है किन्तु फिर भी भोगे जीवन का यथार्थ साफ़ दृष्टिगोचर होता है . यह सरलता से देखा जा सकता है की कविताओं में उन्होंने जीवन, समाज, प्रकृति, संस्कार इत्यादि के प्रति अपनी सोच को ही ढाला है कविताओं में .
एक सरल सुन्दर और सुग्राह्य काव्य संकलन इसे कहा जा सकता है . भाषाई कमियों पर थोड़ा-सा सम्पादकीय निरिक्षण और होता तो शब्दों के जानकार भी और ख़ुश होते किन्तु मेरे जैसे सामान्य पाठक ने इसका भरपूर आनंद लिया , क्योंकि कविता में शब्दों की त्रुटियों को भावों के रंग और खुशबू छिपा लेते हैं . रजनी छाबड़ा जी को इस काव्य संग्रह के लिए मेरी असीम शुभकामनायें और साथ ही कृतज्ञता भी व्यक्त करना चाहता हूँ उनकी सहृदयता के लिए , जो उन्होंने मुझे इस किताब को भेजकर दिखाई है .
शुभ हो ...जय हो !
शब्द मसीहा
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