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SWAYAMPRABHA : पाठकीय प्रतिक्रिया/श्री राम शरण अग्रवाल

  मित्रों , आप सब के साथ सांझा कर रही हूँ मेरी नवीनतम अनुदित कृति SWAYAMPRABHA पर मेरे सुधि मित्र श्री राम शरण अग्रवाल जी की पाठकीय प्रतिक्रिया/ स्वयंप्रभा' मिली। आभारी हूँ आपका आपके स्नेह भाव के लिए। भारत में भारतीय विरासत के जीवंत रहने का एक निर्णायक कारण है संवाद की सहजता। बुद्ध से तुलसी तक यह परंपरा साहित्य का श्रृंगार बन गयी। मीरा, कबीर,बिहारी ने इसे नए आयाम दिए। प्रस्तुत रचना ने, कविताओं ने मुझे भाव विभोर किया है,उसमें अभिव्यक्ति की सहजता, मनोभावों का प्रवाह, अंत: स्पर्श बन जाता है। प्रस्तुत पुस्तक की प्रकृति और प्रस्तुति तथा अनुवाद में यह सब कुछ अक्षुण्ण है। मानस के उद्धरण कहीं न कहीं मुझे स्वनामधन्य अज्ञेय का स्मरण कराते हैं, उनकी पंक्ति है " विगत हमारे कर्मों का लक्ष्य नहीं है परंतु उसकी अनिवार्य पृष्ठभूमि तो है।" यदि ऐसा नहीं होता तो न " Path" होता और ना ही " The Earth" यह भी शाश्वत है कि " They have been shown as victorious; but ultimately, they are being conquered by our moral attributes." पुस्तक के आमुख से। यह तो हमारा प...

छोटी होती हुई दुनिया’ सुशील कुमार समीक्षक : रजनी छाबड़ा

  विलुप्त होती हुए रिश्तों की सौंधी महक की कसक रजनी छाबड़ा साहित्यिक गलियारे का ग्यारवाँ मील का पत्थर छूता, सुशील कुमार का कविता संग्रह ‘छोटी होती हुई दुनिया’ उनकी सोच के विभिन्न पहलुओं को बयान करता है। आंचलिक परिवेश, रिश्तों की गरिमा, प्राकृतिक सौन्दर्य पर हावी होता पर्यावरण प्रदूषण, जल प्रदूषण, प्रदूषित मन, आहत भावनाएं, मानवीय बोध सहेजे हुए, संवेदनाशील रचनाओं का संग्रह है। स्वयं कवि के शब्दों में- एक बड़ा कैनवास छोटा हो गया है; बहुत संकुचित हो गए हैं लोग/ बस इन्हें छोटे परिवेश में जीना है। आक्रोशित मन उनकी रचनाओं में अभिव्यक्ति पा रहा है। इस काव्य संग्रह में कुछ कर गुजरने की चाह है तो सामाजिक ताने-बाने को तार तार होने से रोकने का प्रयास भी झलकता है। कवि स्वयं को लोगों के बीच की एक कड़ी मानते हैं, जिन से वह कभी नहीं टूटता, उन्ही के सुख दुःख में अपने होने का मर्म तलाशता है और उन्ही के सरोकारों को वाणी देते हुए ऐसे जनपयोगी सरोकारों के सृजक के रूप में यहां उपस्थित है। गाँव के बड़े परिवेश में कवि का बचपन गुजरा, इसी परिवेश से कवि की संवेदना का काव्यात्मक भावनात्मक जन्म हुआ। गाँव के प्रा...

आस्था के बुत" (पिघलते हिमखण्ड) समीक्षक डॉ शिव कुमार प्रसाद

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  मन्दिर और मस्जिद के बहाने ---------------------------------- बहुत दिनों के बाद विदुषी रजनी छाबड़ा की एक छोटी सी रचना "आस्था के बुत" (पिघलते हिमखण्ड) को यूँ ही पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते कुछ लिखने की इच्छा बलवती होने लगी। एक पाठक के रूप में सबसे पहले शीर्षक पर नजर गई। आस्था भला बुत कैसे हो सकता है! आस्था का शाब्दिक अर्थ है-विश्वास। यकीन। Faith.बुत का अर्थ है- मूर्ति।बुत। Sculpture. निश्चित रूप से मेरी मान्यता है कि विश्वास अमूर्त होता है।यह मानव के भावों में निवास करता है।फिर यह मूर्ति में कैसे परिवर्तित हो सकता है? स्पष्टत: शीर्षक के दोनों अंश एक-दूसरे के विरोधी हैं। फिर रचनाकार को ऐसे प्रबल विरोधी अंशों को एक साथ रखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? किन्तु जब कविता में व्यक्त अर्थात्मक और व्यंगात्मक सम्प्रेषण को पढ़ा तो शीर्षक स्पष्ट होने लगा। शहरों की गलियों में नित नये-नये आस्था के प्रतीक मन्दिर और मस्जिद बनाये जाते हैं।हर धर्म के अपने-अपने नियम-कायदे वहाँ लागू कर दिये जाते हैं।उन नियम- कायदों में भूले हुए लोग अपने इबादत और इबादतखाने के अलाबे औरों...

भीगी गलियाँ, बिखरा काँच :ओम प्रकाश गासो समीक्षक : रजनी छाबड़ा

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  Rajni Chhabra O c t o 6 b e S 1 r   o n 1 4 8 ,   2 0 o f 1 r 8 l e a l 3 f    ·  भीगी गलियाँ, बिखरा काँच कविता रचेयता: ओम प्रकाश गासो पेपर बेक एडिशन मूल्य: ५०/- प्रकाशक: मित्र मंडल प्रकाशन, बरनाला मानवीय संवेदनाओं की कलात्मक प्रस्तुति पंजाबी के लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार और चिन्तक श्री ओम प्रकाश गासो जी वयोवृद्ध लेखक हैं व् पंजाबी में ५० से अधिक पुस्तकें लिखने के साथ ही साथ बीसंवी सदी के अंतिम दशक से हिंदी साहित्य में भी अपनी सशक्त लेखनी से विशिष्ट पहचान बना चुके हैं/ भीगी कलियाँ, बिखरा काँच सामाजिक मूल्यों के पतन, राजनेतिक व् धार्मिक क्षेत्र की विसंगतियों पर सटीक प्रहार है/ पारिवारिक व् व्यक्तिगत जीवन यथार्थ को सहज ढंग से उजागार करती, ओम जी की यह लम्बी कविता, छटपटाहट और आक्रोश की सशक्त अभिवय्कति है/ विलुप्त होते जीवन मूल्यों और आधुनिकता की अंधी दौड़ से कवि क्षुब्ध है, परन्तु कलम का हथियार हाथ में लिए, इस परिवेश को बदलने के लिए पूरे हौंसले से प्रयत्नशील है/ इसी संकल्प से ही तो उभरी हैं इतनी गहन और चेताने वाली कवितायेँ/ ओम जी के इसी काव्य से कुछ पंक्तियाँ...