आस्था के बुत" (पिघलते हिमखण्ड) समीक्षक डॉ शिव कुमार प्रसाद
मन्दिर और मस्जिद के बहाने
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बहुत दिनों के बाद विदुषी रजनी छाबड़ा की एक छोटी सी रचना
"आस्था के बुत" (पिघलते हिमखण्ड) को यूँ ही पढ़ने लगा।
पढ़ते-पढ़ते कुछ लिखने की इच्छा बलवती होने लगी।
एक पाठक के रूप में सबसे पहले शीर्षक पर नजर गई।
आस्था भला बुत कैसे हो सकता है! आस्था का शाब्दिक अर्थ है-विश्वास। यकीन। Faith.बुत का अर्थ है-
मूर्ति।बुत। Sculpture.
निश्चित रूप से मेरी मान्यता है कि विश्वास अमूर्त होता है।यह मानव के भावों में निवास करता है।फिर यह मूर्ति में कैसे परिवर्तित हो सकता है? स्पष्टत:
शीर्षक के दोनों अंश एक-दूसरे के विरोधी हैं। फिर रचनाकार को
ऐसे प्रबल विरोधी अंशों को एक साथ रखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? किन्तु जब कविता में व्यक्त अर्थात्मक और व्यंगात्मक सम्प्रेषण को पढ़ा तो शीर्षक स्पष्ट होने लगा।
शहरों की गलियों में
नित नये-नये आस्था के प्रतीक मन्दिर और मस्जिद बनाये जाते हैं।हर धर्म के अपने-अपने नियम-कायदे वहाँ लागू कर दिये जाते हैं।उन नियम- कायदों में भूले हुए लोग अपने इबादत और इबादतखाने के अलाबे औरों के
दीनो मज़हब को बिल्कुल भुला देते हैं।
कवयित्री रजनी छाबड़ा की कविता में यहीं से आस्था बुत
में परिवर्तित होने लगती है।
सच में जब पूजा अथवा इबादत दिखावा बनने लगता है , मन्दिर -मस्जिद सजावटी हो जाते हैं तो वहाँ से धर्म और इमान तिरोहित होने लगता है और मानवता लहु-लुहान होने लगती है।
अपने-अपने सतही धार्मिक विद्रुपताओं के कारण दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति वे इतने असहिष्णु हो जाते हैं कि उनके रक्त से धार्मिक पाखण्ड रचते रचते अन्जाने ही वे खुद बुत बन जाते हैं।मेरी मान्यता है कि अगर
इन्सान चाहे तो आस्था के इन बुतों को पिघलाकर मानवता रूपी धर्म के रूप में परिवर्तित कर खुद को बुत बनने से सहज ही बचा सकते हैं।
इस कविता में रचना प्रक्रिया आरंभ से अन्त तक अपने अर्थ और भाव विकास को
सम्यक रूप देने में सक्षम है।
यही विशेषता एक परिपक्व रचनाकार और रचना की सार्थकता को स्थापित करने में सक्षम होता है।
डॉ शिव कुमार प्रसाद
हिन्दी विभाग,
एच पी एस काॅलेज,
निर्मली, सुपौल ।
8544222097
आस्था के बुत
आस्था के बुत
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हर शहर की
हर गली में
कुछ बुतखाने और
कुछ इबादतखाने होते हैं
जहां लोग
अपनी अपनी
आस्था के बुत
बना देते हैं
अपने अपने
रस्म-ओ-रिवाजों से
उनको सजा लेते हैं
बाकी दुनिया के
धर्म कर्म से फिर
वो बेमाने होते हैं
धीरे धीरे
इस कदर
खो जाते हैं
सतही इबादत में, कि
अपने धर्म कों
अपने ईमान से
सींचने कि बजाय
रंग देते हैं
उनके खून से
जो उनके मज़हब से
बेगाने होते हैं
आस्था के बुत
बनाते बनाते
उन्हें मालूम ही नहीं चलता
कि वो खुद कब
बुत बन जाते हैं
रजनी छाबड़ा

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