छोटी होती हुई दुनिया’ सुशील कुमार समीक्षक : रजनी छाबड़ा
विलुप्त होती हुए रिश्तों की सौंधी महक की कसक
रजनी छाबड़ा
साहित्यिक गलियारे का ग्यारवाँ मील का पत्थर छूता, सुशील कुमार का कविता संग्रह ‘छोटी होती हुई दुनिया’ उनकी सोच के विभिन्न पहलुओं को बयान करता है। आंचलिक परिवेश, रिश्तों की गरिमा, प्राकृतिक सौन्दर्य पर हावी होता पर्यावरण प्रदूषण, जल प्रदूषण, प्रदूषित मन, आहत भावनाएं, मानवीय बोध सहेजे हुए, संवेदनाशील रचनाओं का संग्रह है। स्वयं कवि के शब्दों में- एक बड़ा कैनवास छोटा हो गया है; बहुत संकुचित हो गए हैं लोग/ बस इन्हें छोटे परिवेश में जीना है।
आक्रोशित मन उनकी रचनाओं में अभिव्यक्ति पा रहा है। इस काव्य संग्रह में कुछ कर गुजरने की चाह है तो सामाजिक ताने-बाने को तार तार होने से रोकने का प्रयास भी झलकता है। कवि स्वयं को लोगों के बीच की एक कड़ी मानते हैं, जिन से वह कभी नहीं टूटता, उन्ही के सुख दुःख में अपने होने का मर्म तलाशता है और उन्ही के सरोकारों को वाणी देते हुए ऐसे जनपयोगी सरोकारों के सृजक के रूप में यहां उपस्थित है।
गाँव के बड़े परिवेश में कवि का बचपन गुजरा, इसी परिवेश से कवि की संवेदना का काव्यात्मक भावनात्मक जन्म हुआ। गाँव के प्राकृतिक सौन्दर्य के परिदृश्य भरपूर हैं, इस काव्य संग्रह में। पुरवा, पंगडंडियाँ, खेतों की हरितमा, सरसों के फूल, मटर की फलियाँ, गेहूं की बालियाँ, बागों की छांव, बड़ा कुआँ, बड़ा तालाब, नीम की छाँव, गूलर और बरगद के विशालतम वृक्ष; कवि के कुशल शब्द चित्रण से आँखों के आगे सजीव हो उठते हैं। गाँवों के फसली प्राकृतिक सौन्दर्य के सृजन की छवि उकेरने में कवि की लेखनी ने कमाल कर दिया है-
गेहूं के पौधों पर हरिताभ भहरा गया है
चुबुलाहट है दुधिया बालियों की
लिपटती/चिमटती।
सुग्गे मरमरा कर/ भड़कते मारते
लाल चोंच से/ गा रहा है शिशिर
खिलखिलाहट है/ गेहूं के मुख पर
आ गयी शिशिर ऋतु
(कुल परम्परा)
मन की कोमल भावनाओं को खूबसूरती से उकेर रही इन पंक्तियों के माध्यम से कवि का भावुक मन उजागर हुआ है। सपनों की दुनिया में विचरण करने का आनंद अनूठा ही है; पर जीवन की वास्तविकता तो सच के धरातल में ही निहित है।
सपने अपने कब होते है?
मचलती/ छेड़ती/ दोस्ती करते
स्वाद सा समूचे वातावरण से
कुट्टी कर न जाने
कब/कहाँ/ चले जाते हैं
(सपने अपने कब होते)
सच ही तो है, सपने गर हकीकत होने लगें, तो सपने क्यों कहलायें? बात जब रचनाकार के दिल से निकलती है तो सीधे पाठक के दिल को छूती है। एक गहरा रिश्ता कायम हो जाता है, कवि और पाठक के बीच, काव्यात्मक- भावनातमक। भाषा अपेक्षाकृत सरल और सहज है, परन्तु गहन विचार सहेजे हुए है। मनुष्य धरती पर अवतरित हुआ, पर मानवता का धर्म निभाना भूलता चला गया/ स्वर्ग समान धरती, अपने नैसर्गिक गुणों से विहीन होती जा रही है। धरती को स्वर्ग सरीखा बनाने के स्थान पर, आज का मानव उसके नैसर्गिक सौन्दर्य को ही नष्ट करने पर उतारू है।
सत्ता ने भेजते समय
सन्देश दिया
‘तुम स्वर्ग को पृथ्वी पर
ले जा रहे हो
पृथ्वी को स्वर्ग बना कर आना’
किन्तु कितनी बड़ी होती हुई दुनिया
कितनी छोटी हो जाती है
पैंतरेबाजी में/सिकुड़ जाती है
उसकी दरिया दिली
और वह एक-दो के बीच ही रह जाता है
(छोटी होती हुई दुनिया)
कवि का अपनी मिट्टी से जुड़ाव हैं और शहरीकरण के दम घोंटू असर से मन में टीस उठती है। गाँव अपना मूल स्वरूप खोते जा रहे हैं, मानसिक स्तर पर और भौतिक स्तर पर भी। कभी कभी मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू से दूर हटता वातावरण सैंकड़ों सवाल खड़े कर देता है। हमारी सभ्यता और संस्कृति की फीकी पड़ती चमक से दम घुटने लगता ह॥ गाँव के खुशबू में भी अब शहरीकरण और राजनीति का जहर घुलने लगा है।
वहाँ भी दादी की चारपाई के चारों ओर
राजनीति ही फूलती रही
वाह खूब राजनीति! तू गाँव-गाँव पसरी हुई
खुशियाँ छीन रही हैं परिंदों की
वह सड़क भी चुचुहाने लगी है
जब से सड़क का रिश्ता हो गया है हाईवे से बस
(गाँव की खुशबू)
सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक विघटन का दर्द कविमन को विचलित करता है और आक्रोशित मन अनायास ही अपने भावों को शब्द प्रवाह दे देता है।
पृथ्वी तुम सदियों से हम सब का भार
उठाये/ बिना बताये/ बिना झल्लाये
सब कुछ सहते हुए/ एक अनवरत रचना को
संजोये/ हम सबको घर देती हो/
अनबन में लड़ते हैं
बटवारा करते हैं तुम्हारे अंगों का
चुपचाप उस समय भी यात्रा करती हो
बस थोड़े थोड़े टुकड़े लेकर, जी जाते हैं हम
पर इस टुकड़े टुकड़े के अंशों पर
मौन हो शांत रहती हो
हम सबको घर देती हो
(हम सबको घर देती हो)
पावन पुनीत गंगा का प्रदूषण कवि के मन को सालता है। गंगा से संवाद करते हुए कवि उस से अपने पुरातन रूप में वापिस आने का आह्वान करता है-
लगता है गंगा तुम टूट चुकी हो
आदमी को तारने की दीवानगी का बीड़ा
उठाया गंगा/ फिर क्या हुआ
तुम सुख रही हो/चिंतित हो
इतना मत हो कि सूख कर काँटा हो जावो
चुभो सबकी आँखों में/ सरकिंडा हो जावो
जागो गंगा जागो/ जागो फिर जागो
(जागो गंगा जागो)
अपने आस पास बिखरी छोटी छोटी खुशियाँ सहजने में भी कवि निपुर्ण है। यही खुशियाँ तो हमारे जीवन में सरसता प्रदान करती है। उन्मुक्त बचपन की एक दिलकश झलक सीधे सरल शब्दों में/ ठुनकते हुए कान्हा अवतरित होने लगते हैं आँखों के सम्मुख-
वह आँगन में खेलता अपनी लगन में
कुछ इधर उधर करता
और कुछ अपने में बतियाता
तोतली भाषा में नया पथ रचता
कुछ शर्माता/ कुछ मुस्काता
कुछ छुप छुप कर आँगन को गुलज़ार करता
(अकेला वह मगन है)
रिश्तों की गरिमा भी जीवन को जीने योग्य बनाती है। अपने जीवन आधार को भला कोई कैसे विस्मृत कर सकता है। माँ की यादों के साए में बसर करते हुए, कवि महोदय ने बचपन की यादों का दोहरान निहायत सरल सरस शब्दों में किया है-
बचपन से ही उनकी नज़रों ने
मुझे कामयाब बनाया
बचपन में पाठशाला में जाने के लिए
कपड़े पहनती/ बाल काढ़ती
और पट्टी को रगड़ रगड़ चमकाती
बुरका में रौशनाई भरती
सरकंडे की कलम बनाती
एक झोले हिंदी वर्णमाला की पुस्तक धर
कंधे पर लटका देती
मैं निकल पड़ता पाठशाला की ओर
(मदर्स डे पर माँ की याद)
सामाजिक विसंगतियां कवि के मन को कचोटती है। आधनुकिता के इस दौर में, हमारे बुजुर्ग, हमारे घर का ताज, ता उम्र घर में अवहेलित पड़े रहते है। आजीवन रोजमर्रा की छोटी छोटी आवश्यकतों की पूर्ति के लिए तरसते है और फिर, दुनिया से उनकी अंतिम विदाई के बाद, रीति-रिवाजों, संस्कारों को निभाने का ढोंग क्यों? बहुत सटीक शब्दों में कवि ने अपने यह विचार रखें हैं इस कविता के माध्यम से-
वाह रे श्राद्ध देवता
खूब मज़ाक किया है तुमने
मनुष्यों के साथ
ज़िन्दगी है तो भोजन नहीं
कपड़ा नहीं
दवा नहीं
सोने की जगह नहीं
मरने पर सब कुछ
कौवे मौज में है
पंडित स्वर्ग दिखाते अपने यजमानों को
लोकार्पित पिता को देखो
खो जाते है जो जीते जी
उनके जाने पर भर जाती हैं अपार श्रद्धा
पुत्रों में/ बड़े भक्त दिखते हैं श्राद्ध में
मैं ऐसे श्राद्ध पुत्रों को नमन करता हूँ /
बड़े मौज में है कौवे/
(वाह श्राद्ध)
जीवन दर्शन की गहराई भी कवि ने नपे तुले शब्दों में उत्कृष्टता के साथ व्यक्त की है। आध्यात्मिक बोध उभरता हैं, सहज, सरल शब्दो में रचित उनकी कविताओं के माध्यम से। वक्त की धारा के संग संग बहना और कुछ न कहना/ इस जीवन की झलक दिखाती गहन पंक्तियों की ओर भी एक नज़र डालिए।
तिनका ही सही
लीन हूँ/ उस बहाव में
जिसे नदी ने अपनी धारा में
समाहित कर लिया है
बस चलता जा रहा हूँ
कब तक बहना है/ कहाँ जाना
किस छोर
यह वह नदी भी नहीं जानती
बस ले चल रही है अपनी छाया के साथ
मगन हूँ/ यही नियति है
लगन है
बस बह रहा हूँ
कविता यथार्थ और कल्पना का सुमेल होती है जो आन्तरिक संतुष्टि भी प्रदान करती है और आनंद की अनुभूति भी। समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है, सुखांत या दुखांत, कवि के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है और यह प्रभाव प्रकट होता है, शाब्दिक रूप में कविता के माध्यम से। सुशील जी सवेदनशील स्थिति से निकल कर् मनोभावों को कविता के रूप में उकेरते है। वह एक सुचेत कवि है जो समाज के प्रति अपने दायित्व को बखूबी समझते हैं। उन की कविताओं में समकालीन जीवन के प्रासंगिक चित्र दृष्टिगोचर होते हैं। जहाँ तक कविता- वस्तु का प्रश्न, इन कविताओं ने अपने कलेवर में लगभग उन समग्र विषय वस्तुओं को अंगीकार किया है, जिन से जीवन पथ के राही अक्सर रूबरू होते हैं।
कविताओं के रूप में, कवि ने मन भावो का मंथन कर, शब्द अमृत को पाठकों तक पहुँचाया है। किसी विशिष्ट दायरे में सीमित न रह कर, उनकी काव्य शैली सामान्य और प्रबुद्ध वर्ग, दोनों पर ही समान रूप से प्रभाव छोडती है। आशा है इस विविधवर्णी काव्य पुष्प गुच्छ की सुगंध दूर दूर तक सुधि पाठकों तक पहुंचेंगी।
छोटी होती हुई दुनिया (कविता संग्रह) सुशील राकेश
प्रकाशक- उत्कर्ष प्रकाशन, मेरठ
संस्करण-२०१९
मूल्य-रु.२००/-मात्र
पृष्ठ-१६८
संपर्क : रजनी छाबड़ा
1201, टावर 6, वैली व्यू एस्टेट,ग्वाल पहाड़ी
गुरुग्राम फरीदाबाद हाईवे ,
गुरुग्राम (हरियाणा) 122003
मो. 9538695141
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