प्रस्तावना : जड़ां नाल रिश्ता सपनों का वितान और यादों का बिछौना/ नहीं रहता इनसे अछूता/ मन का कोई भी कोना/ जीवन की छोटी छोटी खुशियाँ और यादों के मधुबन हमारी अमूल्य निधि हैं/ रिश्तों की गरिमा, अपनों का सानिध्य, अस्तित्व की पहचान और सौहार्द पूर्ण सह-अस्तित्व यही तो ताने -बाने हैं हमारे सामाजिक परिवेश के/ यदि यही सामजिक ताना -बाना तार-तार होने के कगार पर हो, कवि का संवेदनशील मन अछूता कैसे रह पायेगा/ यही अनुभूतियाँ कलमबद्ध करने का प्रयास किया है, अपनी काव्य-कृति ' जड़ां नाल रिश्ता' के माध्यम से / भावों और अभावों के कुछ संवेदनात्मक शब्द-चित्र बचपन से लेकर उम्र के आख़िरी पड़ाव तक का सफर, बहुआयामी चिंताएं, अन्याय, उत्पीड़न, नगरीकरण का दबाव, अपनी माटी की महक, जीवन मूल्यों के प्रति निष्ठा, संस्कारों के प्रति आस्था, अबोले बोल और आकुलता ऐन्द्रिय धरातल पर कुछ बिम्ब बनाते हैं/ इन्हे शब्दों का रूप दे कर उकेरा है/ जो दूसरों के दर्द को निजता से जीता है भावनाओं और संवेदनाओं को शब्दों में पिरोता है वही कवि कहलाता है यही दायित्व...
इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट
समीक्षा ****** काव्य संग्रह : ख़ामोशी की चीखें
' एक चुटकी इश्क़ ': डॉ.स्वाति चौधरी
हाल ही में, डॉ. संजीव कुमार प्रकाशक इंडिया नेटबुक्स , नॉएडा के आवास पर एक पारिवारिक स्नेह -मिलन में साहित्य जगत की कुछ प्रतिष्ठित हस्तियों के साथ ही साथ, एक नए चेहरे से मुलकात हुई; ऊर्जावान , मृदुभाषी डॉ स्वाति चौधरी/ सौम्य, विनम्र व् मितभाषी डॉ.स्वाति ने पहली ही मुलाकात में मुझे प्रभावित किया/ सस्नेह अपना सद्य प्रकाशित काव्य-संग्रह ' एक चुटकी इश्क़ ' भेंट किया/ व्यस्तता के कारण पढ़ नहीं पायी/ आज पढ़ना शुरू किया तो पूरा पढ़े बिना रुक नहीं पायी/ लौकिक से अलौकिक प्रेम की कविताएँ / छोटी छोटी कविताएं , परन्तु इतने गहरे भाव समेटे हुए कि एक ही कविता को बार बार पढ़ा, गहराई तक पैंठने के लिए/ सीतामढ़ी से मेरे वरिष्ठ मित्र, कला इतिहास विद व् छाया-चित्रकार ने मेरे काव्य-संग्रह 'आस की कूंची से 'पढ़ने के बाद टिप्पणी की थी ," बत्तख जब लहरों के ऊपर तैरती रहती है, कोई निशान नहीं छोड़ती; परन्तु जब पानी में और गहरे पाँव चलाती है ,स्वतः लहरें बनने लगती है और उथल-पुथल मच जाती है और गहरे निशान छोड़ जाती है/ ऐसी हैं आपकी कविताएँ /" कुछ ऐसी ही अनुभूति म...
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें