कविता संग्रह :कहाँ है मेरा आकाश कवयित्री ;नीलम पारीक समीक्षक :रजनी छाबड़ा
कविता संग्रह :कहाँ है मेरा आकाश
कवयित्री ;नीलम पारीक
समीक्षक ;रजनी छाबड़ा
दैनिक युगपक्ष बीकानेर में प्रकाशित
काव्य संग्रह : कहाँ है मेरा आकाश
कवयित्री : नीलम पारीक
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
पेपर बेक
मूल्य : रु. १२०/-
एक पर कटे पंछी सा घायल एहसास
कुछ समय पहले प्रिय मित्र नीलम पारीक से उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘कहाँ है मेरा आकाश’ भेंट स्वरुप मिला/ संग्रह में शामिल रचनाएँ मन को बाँध लेती है/ पढना शुरू किया तो सोचा था की धीरे धीरे सब कवितायेँ पढ़ लूंगी; पर ऐसा नहीं हुआ/ विचारों की रवानगी व् सहज, सरल भाव अभिव्यक्ति ने इतना प्रभावित किया कि पूरा संग्रह एक ही बार में पढ़ डाला/ व्यस्तता के कारण, चाहते हुए भी, इस बारे में विचार व्यक्त नहीं कर पाई/ आज मेरी फुर्सत के कुछ क्षण नीलम जी और उनकी काव्य कृति को समर्पित हैं/
इस काव्य संग्रह की कवितायेँ प्रेम, त्याग, सामंजस्य, बचपन की मधुर यादें, प्रकृति प्रेम, समाज में पनप रही विसंगतियों के प्रति विरोध के स्वर व् आक्रोश के स्वर मुखर करती है/ बिना किसी दुरुहता के, सहज ढंग से सरल भाषा में मन के भाव उकेरे गए है/ कहीं कहीं विदेशी भाषा शब्द प्रयोग, भावों की गहराई तक पहुँचाने में प्रभावी रहा है , जैसे कि ‘’haunted अतीत”
कविता की रचना का मूल मन्त्र देती, नीलम जी की एक छोटी सी कविता
तितलियों के परों सी......
फूलों की पंखुड़ियों सी......
इत्र की महक सी
हवा के परों पर सवार
कानों को छू जाएँ
वो बातें तो बन जाये कविता (पृष्ठ ३१)
कुछ लीक से हट कर सोचती हैं कवयित्री महोदया
समन्दर
कर के आत्मसात
अपने जल का खारापन
मित्र बादल के संग
भेज देता है
बहन धरा के घर
उसकी संतान के लिए
मधुर निर्मल जल
धन्य हो समन्दर तुम! (पृष्ठ ६१)
धर्म और राजनीति के खेल से आहत, उनकी कलम इस दर्द को कुछ यूं बयान करती है
बाँट लिए रंग
लोगो ने धर्म के नाम पर
राजनीति के नाम पर
हो गया खण्ड-खण्ड
इन्द्रधनुष (पृष्ठ ११९)
कवयित्री सामाजिक ताने बाने में खुद को उलझी हुई महसूस करती है और विक्षप्तियों के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाने का दम रखती है/
मैं तो ममतामयी हूँ, प्रेममयी हूँ, स्नेहमयी हूँ
मैं लक्ष्मी भी हूँ
सरस्वती भी
लेकिन मत भूलो
मैं काली भी बन सकती हूँ
और इस बार किसी महिषासुर के लिए नहीं, तुम्हारे लिए
मत करो विवश
मुझे छोड़ने को अपना नारीत्व (पृष्ठ ३०)
संग्रह की शीर्षक कविता ने तो मन को गहरे से मथ दिया और पढ़ते ही, मैंने इसका अंग्रेजी में व् मेरे एक कवि मित्र ने कमेंट बॉक्स में ही मैथिली अनुवाद पोस्ट कर दिया, फेसबुक पर
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माँ
तू तो कहती थी
बेटियाँ तो होती हैं चिडिया
पर माँ
चिड़ियाँ तो उडती हैं
खुले आकाश में
मैं चिड़िया हूँ तो
कहाँ हैं मेरा आकाश? (पृष्ठ ८७)
ईश्वर से प्रार्थना हैं की नवोदित कवयित्री नीलम पारीक, साहित्य जगत में कामयाबी के शिखर पर पहुंचे, उन शिक्षा रूपी पखों की उड़ान से जो उनके मम्मी पापा से उन्हें दिए और आकाश में उड़ने का हौंसला भी/
रजनी छाबड़ा
बहु-भाषीय कवयित्री व् अनुवादिका




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