शब्दिका: काव्य संग्रह
शब्दिका: काव्य संग्रह
रचनाकार: डॉ संजीव कुमार
प्रकाशक : वनिका प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशक : वनिका प्रकाशन, दिल्ली
पेपरबैक
मूल्य: रु २५०/- मात्र
शब्दों में पिरोये मनोभावों की माला
समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. संजीव कुमार की कृति शब्दिका पर अपने कुछ विचार सुधि पाठकों के समक्ष रखना चाह रही हूँ/ ५ प्रबंध काव्य व् ३२ काव्य संग्रह रचने के उपरान्त भी उनकी साहित्यिक यात्रा तीव्र गति से चल रही है/
'शब्दिका ' से पूर्व, डॉ. संजीव की काव्य कृतियॉं अंतरा, आकांक्षा, ऋतुम्भरा व् अपराजिता पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला; परन्तु इस काव्य कृति का अंदाज़ कुछ अलग ही है/ मन के भाव अत्यंत सहजता से उकेरे गए है और पाठक स्वतः इस शाब्दिक प्रवाह में बह जाता है/ अनुभूति के विभिन्न आयामों का सतरंगी गुलदस्ता है 'शब्दिका'/
अतीत और वर्तमान की बीच का सफर और उज्जवल भविष्य के सपने, ज़िंदगी की आपाधापी, घर -गाँव के प्रति मोह, इच्छाएँ, आकांक्षाएँ, उम्मीद के स्वर, प्रकृति के मनमोहक दृश्य सभी कुछ अत्यंत प्रभावी रूप से समाहित है/ उनकी रचनाओं में विविधता प्रभावित करती है/ समूचे सामाजिक परिवेश की विद्रूपता के उपरान्त भी कवि उज्जवल भविष्य के प्रति आशावान है/
इस गहन अभिव्यक्ति के काव्य संग्रह 'शब्दिका' में सीधे सादे शब्दों में बहुत गहरे अर्थ छुपे हैं/ कवि से सरल, सहज मन् से मन के भावों को उकेरा है/ उनकी कवितायेँ पाठक के मन से सहज संपर्क बना लेती हैं/
स्वयं कवि महोदय के शब्दों में:
१ शब्द
कभी अर्थ नहीं बताते
खोजना होता है
शब्दों के मन में गहरे उतर कर
उनका भाव (पृष्ठ १५)
१ शब्द
कभी अर्थ नहीं बताते
खोजना होता है
शब्दों के मन में गहरे उतर कर
उनका भाव (पृष्ठ १५)
२ जीवन पथ पर अभी भी कई अवरोध है/ कितने ही प्रश्न अभी भी हमारे सामने मुहँ उठाये खड़े हैं, परन्तु कवि के मन में आस के दीप जल रहे हैं/
किन्तु सवालों के हल
अभी भी लापता हैं
और जारी है
अभी भी तलाश
उम्मीद बाकी है/ ( पृष्ठ २१)
किन्तु सवालों के हल
अभी भी लापता हैं
और जारी है
अभी भी तलाश
उम्मीद बाकी है/ ( पृष्ठ २१)
३ सीधे सादे ढंग से मन के भावों को उकेरने की कला में कवि निपुण है/
भावों को शब्दों में
रूपायित करते
कोई रंग नहीं भरना
उन्हें मुखर होने दो
उसी भाषा में
उसी रूप में
जिसमें वह जनमे हैं
और बनने दो
अभिव्यक्ति को
एक सीधी सादी
शब्दिका (पृष्ठ १२)
४ कवि ने बिगड़ैल राजनीति पर गहरा कटाक्ष किया है चंद सशक्त शब्दों के माध्यम से
लड़खड़ाते युवा
बहकाते नेता
खतरनाक उत्पति
न्याय की विपत्ति
बिगड़ता परिवेश
कहाँ जाएगा देश //
भावों को शब्दों में
रूपायित करते
कोई रंग नहीं भरना
उन्हें मुखर होने दो
उसी भाषा में
उसी रूप में
जिसमें वह जनमे हैं
और बनने दो
अभिव्यक्ति को
एक सीधी सादी
शब्दिका (पृष्ठ १२)
४ कवि ने बिगड़ैल राजनीति पर गहरा कटाक्ष किया है चंद सशक्त शब्दों के माध्यम से
लड़खड़ाते युवा
बहकाते नेता
खतरनाक उत्पति
न्याय की विपत्ति
बिगड़ता परिवेश
कहाँ जाएगा देश //
इस काव्य संग्रह के प्रकाशन पर मैं डॉ. संजीव कुमार को हार्दिक बधाई देते हुए, कामना करती हूँ कि उनकी लेखनी का यश सदैव बना रहे/ काव्य मनीषियों के हृदय में यह काव्य संग्रह बस जायेगा , ऐसी आशा रखती हूँ/
रजनी छाबड़ा
कवयित्री व् अनुवादिका
कवयित्री व् अनुवादिका
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