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जीवन के पल पल की महक संजोये 'गुलाबी गलियारे'

   पुस्तक- गुलाबी गलियारे- संस्मरण लेखिका- डॉ. अंजु दुआ जैमिनी पृष्ठ संख्या- 116 प्रकाशक- अयन प्रकाशन,वर्ष 2023 मूल्य 280 रुपये जीवन के पल पल की महक संजोये  'गुलाबी गलियारे' ************************************* जीवन पथ पर चलते चलते कुछ यादें ऐसी अमिट छाप छोड़ जाती हैं स्मृति पटल पर कि उनकी महक आजीवन हमारे साथ रहती है/ 'गुलाबी गलियारे' संस्मरण में  जीवन के पल पल की महक संजोये, अंजू दुआ जेमिनी ने बचपन से अब तक की अनुभूतियाँ सहज, सरल, सरस व् रुचिकर ढंग से कलमबद्ध की हैं / बचपन से लेकर अब तक की जीवन यात्रा के विभिन्न छोटे -बड़े अवसरों का उल्लेख इतने जीवंत ढंग से किया गया है कि पाठक अनायास ही स्वयं को उमसे एकाकार करने लगता है / लेखिका का भोगा हुआ यथार्थ , केवल एक व्यक्तत्व के रूप में नहीं उभरता, अपितु कई घटनाओं व् बिम्बों के माध्यम से हम जीवन के कई पहलुओं को गहनता से समझ पाते हैं/ बचपन की छोटी-छोटी नादानियाँ, शोखियाँ व् शरारतें , सहजता व् सरसता से लेखिका अपने पाठकों के समक्ष रखती है/ धीरे -धीरे जीवन परिपक्वता की राह पर चलने लगता है/ शिक्षा, व्यवसाय, वैवाहिक जीवन की जिम्मेव...
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  *स्त्री सम्वेदनाओं का जीवंत दस्तावेज़- गुलाबी गलियारे* -भावना सक्सैना सदा हँसती-मुस्कुराती, चहकती, आत्मविश्वास से लबरेज़, न जाने कितनी मुस्कानों का कारण, फरीदाबाद की प्रतिष्ठित साहित्यकार जो कुछ वर्ष पहले अपनी शर्तों पर लेखन का ध्येय ले सरकारी सेवा के वरिष्ठ पद को अपनी इच्छा से अलविदा कह चुकी हैं... डॉ.अंजू दुआ जैमिनी ने वर्षों पहले, पहली मुलाकात से ही मुझे प्रभावित किया है। हाल ही में अयन प्रकाशन से प्रकाशित उनकी संस्मरणात्मक पुस्तक गुलाबी गलियारे अतीत के पन्नो को टटोलती बेहद रोचक पुस्तक है जो लेखिका के जीवन में एक झरोखे की भांति तो खुलती ही है, साथ ही समाज के कई पक्षों पर संजीदगी से सोचने को विवश करती है, कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है तो संस्मरणों से गुजरते हुए जीवन दर्शन भी रेखांकित कर जाती है। वह लिखती हैं कि कॉलेज में एक ही प्रश्न उनके मन मे उठता था कि मेरा जन्म किस काम के लिए हुआ है। 45 टुकड़ों में जीवन के खट्टे- मीठे अनुभवों को दर्ज करती संस्मरणों की यह श्रृंखला बचपन की बेपरवाही, युवावस्था में स्कूल कॉलेज के अनन्य अनुभव, तीज त्योहारों के उल्लास, सत्तर अस्सी के दशक...

प्रशंसनीय काव्य संग्रह : बात सिर्फ इतनी सी

प्रशंसनीय काव्य संग्रह बात सिर्फ इतनी सी सुप्रसिद्ध बहु-भाषीय कवयित्री, अंकशास्त्र की गहरी ज्ञाता एवं श्रेष्ठ अनुवादिका रजनी छाबड़ा  के इस काव्य संग्रह में भाव एवं कला का अद्भुत संगम है। जहां भाषा का शिल्प आकर्षित करता है वहीं कविताओं में दार्शनिकता जीवन के विभिन्न पहलुओं को  ऊर्जा से सींचती सी , प्रेरणा देती नजर आती है। रचनाओं में प्रकृति बोध, रिश्ते नाते, दुनियादारी, जीवन की विषमताओं व विडंबनाओं को बहुत गहराई से रेखांकित करती है। देखे, सुने और सहे हुए दर्द को शब्दों में ढालती चलती है / कवयित्री  की जीवन शैली को देखने की अद्भुत व पैनी दृष्टि है। जमीन से जुड़े भाव व प्रतीक कविताओं को ऊंचाईयां प्रदान करते हैं। शब्द संयोजन व्  शिल्प सौष्ठ प्रभावित करते हैं।अधूरी आरजू, खामोशी, दीवार, सिलसिला आदि कविताओं में कवयित्री का दृष्टि विस्तार काबिले तारीफ है।निश्चय ही साहित्य जगत में यह कृति अपना विशेष स्थान रखेगी। सकारात्मक दृष्टि कोण से पूर्ण इस काव्य संग्रह के लिए  हार्दिक शुभकामनाएं और बधाईयाँ । कवयित्री की लेखनी अनवरत चलती रहे। इसी मंगल कामना के साथ शकुन्तला शर्मा ...